उलझनें


कुछ उलझन में डाल दिया था उन सवालों ने शायद जवाब ज़हन में न आए या फिर अल्फ़ाज़ लबों तक आकर ठहर गए ये कभी हम समझ न पाए

उस सन्नाटे में नज़रें ही बोल देतीं कुछ अगर शायद उलझनें कुछ जातीं सुलझ कोशिश तो दिल की थी बहुत मगर नज़रों को ही शायद न थी समझ

Siddharth Singh

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