परछाइयाँ


कई सारे थे साये, और थी उनकी परछाई साथ चलते थे कई उसके, और साथ उनकी तन्हाई तलाश तो थी उसको, जो थी उसकी परछाई दिख न पाती मगर, उस भीड़ में जो साथ आई

सिमटते, उलझते, बदलते, कैसे ढूँढ पाता वो हर साये की तन्हाई में खो जाता वो देखते, पूछते, समझते, कहाँ पहुँच पाता वो हर साये की परछाई के पीछे, कैसे फिर जाता वो

देख न पाता वो, कि साये ही परछाई हैं समझ न पाता वो, कि परछाई ही तन्हाई है मान ले वो फिर अगर, कि यही उसकी सच्चाई है परछाई तो यहीं थी हमेशा, पर रोशनी कहाँ से आई है

Siddharth Singh

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