किनारे
लहरों से उलझते हुए कई किनारे देखे उसने कश्ती थी वो, दस्तूर था उसका कुछ यादें चढ़ती, कुछ ख़्वाहिशें उतरती हर किनारे कुछ लम्हे वो बिताती लहरों में रहना फ़ितूर था उसका
लहरों में अक्सर खोया भी ख़ुद को उसने लहर थी वो, फ़ितरत थी उसकी कुछ ख़ुशियाँ सँभालती, कुछ आँसू छुपाती किसी किनारे वो थम भी जाती किनारे थे, वो ज़िम्मेदारी थी उनकी
कई किनारों ने चाहा कि सँभाल लूँ उसे कश्ती थी वो, बहना था उसे रुकना तो थी चाहती, ज़िंदगी भी बितानी बस गहराई है कितनी, समझना था उसे