धुंध
ज़हन में थी एक धुंध जैसे रुकती नहीं, चलती हुई सी थमती नहीं, बढ़ती हुई सी कभी झलकती, कभी थी ढकती नज़रें उसकी देखतीं फिर कैसे
घिरने लगा था एक कोहरा ऐसे सिमटता नहीं, फैलता हुआ सा ठिठुरता नहीं, सिहरता हुआ सा आवाज़ भी देता, सन्नाटे से कहीं कदम उसके ढूँढते फिर कैसे
अकेला नहीं था धुंध में वो वैसे डरता नहीं, ढूँढता रहा था सहमा नहीं, सुनता रहा था इधर उधर अनदेखा, चलता रहा था धुँधले रास्ते उसकी, तक़दीर थी जैसे